रिक्शा

आज मुझे देर हो रही थी। कायदे से तो मैं समय से पंद्रह बीस मिनट पहले ही चल रहा था, मगर रिक्शे के गुज़र जाने का समय हो चुका था।

सोमवार से शुक्रवार, बस एक नजर भर देखना मानो कोई पुरानी रिवायत जैसी थी, जिसे मन, बिना सवाल किए, रोज निभाने को दृढ़संकल्प था।

मैं हड़बड़ाहट में घर से निकला, साइकिल उठाई और इस उम्मीद में कि वो रिक्शा भी लेट हो, चल पड़ा। थोड़ी दूर पर वो रिक्शा नजर आया और उसमें बैठी वो भी, जिसका नाम भी मुझे नहीं पता, मगर जो अनजान भी नहीं थी।

सुकून से भरा मैं, अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा।

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